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चिप्स के पैकेट से बदली किस्मत! इस बंदे ने कचरे से बनाया कुछ ऐसा कि 7 दिन में हुई ₹11 लाख की कमाई, वायरल हुआ आईडिया।

चिप्स के खाली पैकेट से चश्मा बनाकर 1 हफ्ते में 11 लाख कमाए अनीश मालपानी! अमेरिका की नौकरी छोड़ भारत लौटे, MLP कचरे से फैशनेबल सनग्लासेस बनाए। गरीब बीनने वालों को रोजगार, 10% प्रॉफिट बच्चों पर। पर्यावरण बचाओ, स्टाइल अपनाओ – WITHOUT ब्रैंड की अनोखी स्टोरी।

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चिप्स के पैकेट से बदली किस्मत! इस बंदे ने कचरे से बनाया कुछ ऐसा कि 7 दिन में हुई ₹11 लाख की कमाई, वायरल हुआ आईडिया।

सोचिए, वो 5-10 रुपये का चिप्स पैकेट जो हम खाकर कचरे में उड़ा देते हैं, उसी से कोई शख्स लाखों कमा ले। जी हां, मुंबई के अनीश मालपानी ने यही कर दिखाया। अमेरिका में पॉश जॉब छोड़कर भारत लौटे अनीश ने चिप्स पैकेट्स से फैशनेबल सनग्लासेस बनाए और बस एक हफ्ते में 11 लाख का रेवेन्यू ठोक दिया। उनकी कंपनी WITHOUT ने लॉन्च होते ही धमाल मचा दिया – 500 जोड़ियां बिक गईं, हरेक 500 रुपये की। ये कोई जादू नहीं, बल्कि प्लास्टिक कचरे को नया जीवन देने की सच्ची कोशिश है।

नौकरी छोड़ भारत का कचरा सुलझाने चले आए

अनीश की उम्र महज 36 साल है, लेकिन उनकी सोच सौ साल आगे की है। टेक्सास यूनिवर्सिटी से बीबीए करने के बाद वो अमेरिका में सेटल हो चुके थे। लेकिन दिल में मुंबई के देवनार डंपिंग ग्राउंड की तस्वीरें घूमती रहीं – वो प्लास्टिक के पहाड़ जहां गरीब कचरा बीनते हैं।

अनीश ने सोचा, क्यों न कुछ ऐसा करें जो पर्यावरण बचाए और इन मजदूरों को भी ताकत दे। नौकरी लात मार दी और 2020 में आशया रीसाइक्लर्स प्राइवेट लिमिटेड शुरू कर दी। WITHOUT उनका ब्रैंड है, जो दुनिया का पहला ऐसा प्रोडक्ट लाया जो मल्टी-लेयर प्लास्टिक (MLP) से चश्मे बनाता है।

रिसर्च ने बदली कचरे की किस्मत

चिप्स पैकेट जैसे MLP को रीसाइकल करना आसान नहीं। ये प्लास्टिक कई लेयर्स का होता है, जो अलग-अलग पिघलता है। अनीश ने एक केमिस्ट्री पीएचडी वालों को हायर किया और सालभर रिसर्च की। नतीजा? एक ऐसा तरीका मिला जिससे कचरे को हाई-क्वालिटी मटेरियल में बदल दिया। अब उनके चश्मे न सिर्फ मजबूत हैं, बल्कि स्टाइलिश भी – पार्टी में पहन लो तो कोई नहीं कहेगा कि ये रिसाइकल्ड हैं। ये प्लानिंग ही है जो उनकी कंपनी को अलग बनाती है।

कचरा बीनने वालों को दिया नया रोजगार

अनीश सिर्फ चश्मा नहीं बेचते, समाज बदलते हैं। भारत में 10-40 लाख कचरा बीनने वाले हैं, ज्यादातर गरीब। अनीश ने इन्हें चेन में जोड़ा। पुणे वेस्ट पिकर कलेक्टिव जैसी महिलाओं वाली ग्रुप्स से पैकेट कलेक्ट करते हैं। हर किलो के 6 रुपये मिलते हैं बीनने वालों को। एक चश्मे के लिए 5 पैकेट लगते हैं, और बनने में 3-4 दिन। उनकी कंपनी की 10% कमाई कचरा बीनने वालों के बच्चों की पढ़ाई और हेल्थ पर जाती है। अनीश कहते हैं, “समस्या सॉल्व करते हुए इनकी जिंदगी भी संवारनी है।” ये सुनकर मन भर आता है न?

पर्यावरण और बिजनेस का परफेक्ट बैलेंस

एक तरफ लैंडफिल में प्लास्टिक कम हो रहा है, दूसरी तरफ बिजनेस उड़ान भर रहा। WITHOUT के चश्मे खरीदकर आप फैशन तो अपनाते ही हैं, प्लैनेट भी बचाते हैं। साल 2022-23 में 500 जोड़ियां बिकीं, और अब ग्रोथ रॉकेट की स्पीड से। अनीश का मॉडल साबित करता है कि सस्टेनेबल बिजनेस प्रॉफिटेबल भी हो सकता है। गरीबों को सशक्त बनाना, कचरा रिसाइकल करना – ये सब एक पैकेट से शुरू हुआ।

आगे की राह

अनीश रुकने वाले नहीं। वो और ज्यादा प्रोडक्ट्स लाने वाले हैं – बैग्स, वॉलेट्स सब MLP से। उनका टारगेट है लाखों कचरा बीनने वालों को जोड़ना और प्लास्टिक कचरे को खत्म करना। ये स्टोरी बताती है कि एक आदमी की सोच पूरे सिस्टम को हिला सकती है। अगर आप भी कुछ ऐसा करना चाहें, तो WITHOUT की वेबसाइट चेक करें। कौन जानता है, आपका आइडिया अगला गेम-चेंजर बने!

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