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पुश्तैनी जमीन पर HC का बड़ा आदेश! केस चलते समय रिश्तेदारों ने चोरी-छिपे बेच दी जमीन? तो क्या रद्द होगी रजिस्ट्री, जान लो नियम

आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केस के दौरान खरीदी गई जमीन पर 'लिस पेंडेंस' लागू होती है। जानिए क्यों खरीदार पर फैसला तुरंत लागू होगा और रजिस्ट्री रद्द नहीं होगी।

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पुश्तैनी जमीन पर HC का बड़ा आदेश! केस चलते समय रिश्तेदारों ने चोरी-छिपे बेच दी जमीन? तो क्या रद्द होगी रजिस्ट्री, जान लो नियम
पुश्तैनी जमीन पर HC का बड़ा आदेश! केस चलते समय रिश्तेदारों ने चोरी-छिपे बेच दी जमीन? तो क्या रद्द होगी रजिस्ट्री, जान लो नियम

आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण Land Dispute Case में फैसला सुनाया है, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि यदि किसी संपत्ति पर कोर्ट में केस चल रहा हो और उसी दौरान कोई व्यक्ति उसे खरीद ले, तो उसे केस में औपचारिक तौर पर पक्षकार (Party) बनाने की आवश्यकता नहीं है। अदालत ने अपने फैसले में ‘लिस पेंडेंस-Lis Pendens’ के सिद्धांत को लागू करते हुए कहा कि खरीदार पर केस का अंतिम फैसला अपने आप लागू होगा।

यह फैसला आंध्र प्रदेश के अनमैया जिले में स्थित एक पुश्तैनी जमीन के मालिकाना हक को लेकर तीन भाइयों और उनके रिश्तेदारों के बीच चल रहे विवाद से जुड़ा है।

पूरा मामला क्या है?

मामला शुरू हुआ तीन भाइयों के उस दावे से, जिन्होंने अपनी पुश्तैनी जमीन में मालिकाना हक-Ownership जताना चाहा। उनके अनुसार, उनके रिश्तेदार जमीन में बिना अनुमति दखल दे रहे थे। भाइयों ने कोर्ट में स्थायी निषेधाज्ञा-Permanent Injunction की अर्जी भी दी, ताकि उनके हिस्से पर कोई कब्जा न कर सके।

लेकिन, केस चल ही रहा था कि तभी एक रिश्तेदार ने अपने बताए गए 50% हिस्से में से जमीन का एक हिस्सा मिस्टर रेड्डी-Mr. Reddy नामक खरीदार को बेच दिया।

रिश्तेदारों का दावा था कि कुल 3.45 एकड़ पुश्तैनी जमीन में उनका 50% हिस्सा है और उन्होंने उसी हिस्से में से जमीन बेची। शुरुआती दौर में रिश्तेदारों ने बिक्री की बात से इनकार किया और भाइयों पर झूठा आरोप लगाने का दावा किया। बाद में एक रिश्तेदार ने कोर्ट में स्वीकार किया कि उसने 5 नवंबर 2018 को मिस्टर रेड्डी के नाम Registered Sale Deed-रजिस्टर्ड सेल डीड किया था।

इस बिक्री के बाद खरीदार का नाम प्रॉपर्टी रिकॉर्ड्स में दर्ज हो गया। भाइयों ने इसके बाद कोर्ट में अर्जी दी कि मिस्टर रेड्डी को उनके केस में प्रतिवादी-Defendant के रूप में शामिल किया जाए ताकि मालिकाना हक का विवाद सही तरीके से सुलझाया जा सके।

कोर्ट का फैसला: खरीदार को पक्षकार बनाने की आवश्यकता नहीं

आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने भाइयों की अर्जी खारिज कर दी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब कोई जमीन कोर्ट में विवाद-Case में है और उस दौरान कोई उसे खरीदता है, तो उसे केस में पक्षकार बनाना जरूरी नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि खरीदार पर ‘लिस पेंडेंस-Lis Pendens’ का सिद्धांत लागू होता है। इसका मतलब है कि खरीदार को कोर्ट के अंतिम फैसले-Final Judgment से अपने आप बंधा माना जाएगा।

निचली अदालत ने भी इसी आधार पर भाइयों की अर्जी खारिज की थी। कोर्ट ने यह कहा कि खरीदार का हक मालिकाना हक के अंतिम निर्णय से तय होगा। इसलिए, उसे केस में शामिल न करना मूल वादी भाइयों के अधिकार पर कोई असर नहीं डालेगा।

लिस पेंडेंस’-Lis Pendens का क्या मतलब है?

लिस पेंडेंस-Lis Pendens’ एक लैटिन शब्द है, जिसका अर्थ है “कोर्ट में विवाद चल रहा है।”

भारतीय संपत्ति कानून में Property Transfer Act, 1882 की धारा 52 के तहत यह सिद्धांत लिखा गया है। इसका मतलब है कि अगर कोई संपत्ति मुकदमे के दौरान खरीदी जाती है, तो खरीदार उस संपत्ति के मामले में कोर्ट के निर्णय से ही बंधा होता है।

सिंपल शब्दों में:

  • आप संपत्ति खरीद सकते हैं, लेकिन जो जोखिम-मुकदमे का निर्णय कोर्ट बाद में सुनाएगा, वह आपको मानना होगा।
  • खरीदार यह नहीं कह सकता कि “मैं केस में शामिल नहीं था, इसलिए फैसला मुझ पर लागू नहीं होता।”

‘लिस पेंडेंस’ क्यों जरूरी है?

  • यह सिद्धांत अदालतों को बेवजह के झंझटों और बार-बार मुकदमों से बचाता है।
  • किसी भी व्यक्ति को केस के बीच में संपत्ति बेचने से रोकता है, जिससे विवाद और लंबित केस बढ़ सकते हैं।
  • यह सुनिश्चित करता है कि संपत्ति के विवाद का फैसला मूल पक्षकारों के लिए सही और प्रभावी ढंग से हो।

हाई कोर्ट का तात्पर्य और खरीदार के लिए प्रभाव

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:

  • जो व्यक्ति मुकदमे के दौरान संपत्ति खरीदता है, वह स्वतः फैसले से बंधा होता है।
  • उसे हमेशा प्रतिवादी बनाना जरूरी नहीं
  • मूल वादी (भाइयों) को नुकसान नहीं होगा।
  • बिक्री के बावजूद, यदि कोर्ट बाद में फैसला करता है कि रिश्तेदार का दावा गलत था, तो खरीदार अपनी सेल डीड का इस्तेमाल करके फैसला नहीं बदल सकता

केस का निष्कर्ष

आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने भाइयों की अर्जी को खारिज कर दिया और पुश्तैनी जमीन के मालिकाना हक का मुख्य केस खरीदार को शामिल किए बिना आगे बढ़ाने की अनुमति दी

इस फैसले से स्पष्ट हुआ कि ‘लिस पेंडेंस-Lis Pendens’ सिद्धांत भारतीय संपत्ति कानून में कितना महत्वपूर्ण है, और यह सुनिश्चित करता है कि संपत्ति विवाद में नया खरीदार भी कोर्ट के फैसले के अधीन होगा।

केस की अहमियत

यह फैसला उन सभी Land Dispute Cases और Property Ownership Disputes में मार्गदर्शक साबित होगा, जहाँ Court Pending Case के दौरान संपत्ति बेची जाती है। यह निर्णय खासकर Inheritance Property-Pushtaini Zameen, Agricultural Land-Agriculture Land, और Registered Sale Deeds के संदर्भ में बेहद अहम है।

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