
देश में सामाजिक न्याय की दिशा में मील का पत्थर माने जाने वाले 93वें संविधान संशोधन और अनुच्छेद 15(5) को लागू हुए दो दशक बीत चुके हैं, 20 जनवरी 2006 को जब यह कानून प्रभावी हुआ, तो उम्मीद थी कि देश के उच्च शिक्षण संस्थानों की सूरत बदल जाएगी और ओबीसी (OBC) समुदाय के छात्रों को उनका हक मिलेगा, लेकिन 2026 में खड़े होकर जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो हकीकत कुछ और ही बयां करती है, 27% आरक्षण का वादा आज भी कई कानूनी और प्रशासनिक चक्रव्यूहों में फंसा हुआ है।
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निजी संस्थानों में ‘लापता’ कानून
अनुच्छेद 15(5) का सबसे बड़ा उद्देश्य निजी उच्च शिक्षण संस्थानों में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का रास्ता साफ करना था हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में ही इसे संवैधानिक रूप से वैध ठहरा दिया था, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इसके क्रियान्वयन के लिए अब तक कोई ठोस संसदीय कानून नहीं बनाया गया है। नतीजतन, सरकारी और सहायता प्राप्त संस्थानों में तो कोटा लागू है, लेकिन देश के बड़े निजी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में यह आज भी ‘वैकल्पिक’ या नगण्य बना हुआ है।
क्रीमी लेयर: 8 लाख की लक्ष्मण रेखा
छात्रों के लिए दूसरी सबसे बड़ी बाधा ‘क्रीमी लेयर’ की वर्तमान सीमा है, वर्तमान में 8 लाख रुपये वार्षिक आय की सीमा के कारण कई योग्य छात्र आरक्षण के दायरे से बाहर हो जाते हैं, बढ़ती महंगाई के दौर में इस सीमा को न बढ़ाया जाना मध्यमवर्गीय ओबीसी परिवारों के लिए एक बड़ी कानूनी अड़चन बनी हुई है।
रोहिणी आयोग और ‘असमान लाभ’ का सच
हालिया रिपोर्टों और रोहिणी आयोग (Rohini Commission) के आंकड़ों ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है, आयोग की जांच के अनुसार, ओबीसी श्रेणी की लगभग 25% प्रभावशाली जातियां ही कोटे के 97% लाभ पर कब्जा जमाए हुए हैं, वहीं, लगभग 983 ऐसी ओबीसी उप-जातियां हैं, जिनका संस्थानों में प्रतिनिधित्व शून्य के बराबर है, जब तक ओबीसी के भीतर उप-वर्गीकरण (Sub-categorization) लागू नहीं होता, तब तक आरक्षण का लाभ अंतिम पायदान पर खड़े छात्र तक पहुंचना मुश्किल है।
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‘नॉट फाउंड सूटेबल’ (NFS) का खेल
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों और उच्च तकनीकी संस्थानों में ओबीसी की कई सीटें खाली रह जाती हैं, संस्थान अक्सर ‘उपयुक्त उम्मीदवार न मिलने’ (Not Found Suitable) का तर्क देकर इन सीटों को खाली छोड़ देते हैं, छात्रों का आरोप है कि चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और समावेशी नजरिए के अभाव के कारण उन्हें दरकिनार कर दिया जाता है।
क्या है आगे की राह?
2026 की शुरुआत में ही विपक्षी दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025’ के माध्यम से एक एकल नियामक (Single Regulator) बनाने की मांग की है, जो निजी संस्थानों में भी अनुच्छेद 15(5) के पालन की निगरानी कर सके।
सिर्फ कागजों पर 27% आरक्षण लिख देना पर्याप्त नहीं है, जब तक निजी संस्थानों के लिए सख्त कानून, क्रीमी लेयर की समीक्षा और उप-वर्गीकरण जैसे मुद्दों पर ठोस कदम नहीं उठाए जाते, तब तक अनुच्छेद 15(5) का असली सपना अधूरा ही रहेगा।
















