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Live-in Relation पर बड़ा फैसला: शादीशुदा व्यक्ति से संबंध को वैवाहिक दर्जा नहीं, कोर्ट ने याचिका की खारिज

मुंबई हाईकोर्ट का तगड़ा फैसला: शादीशुदा प्रोफेसर के साथ लिव-इन में रहने वाली इंजीनियर महिला को कोई राहत नहीं। सालों साथ रहे, IVF करवाया, प्रॉपर्टी खरीदी, लेकिन कोर्ट ने कहा- जानबूझकर एडल्टरी रिश्ता वैवाहिक नहीं। पहली पत्नी-बच्चों के राइट्स प्रोटेक्ट! प्यार रियल हो सकता है, कानून नहीं मानता। सावधान रहें!

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bombay high court says woman in relationship with married man can not claim domestic violence act relief

मुंबई हाईकोर्ट के इस फैसले ने एक बार फिर दिल तोड़ दिया है। प्यार की वो दुनिया जहां सब कुछ परफेक्ट लगता है, वहां कानून की सख्ती ने एंट्री मार ली। एक महिला, जो अपने पार्टनर के साथ सालों साथ रही, सपने बुनती रही, लेकिन आखिरकार हाथ खाली रह गया। ये कहानी सिर्फ एक केस की नहीं, बल्कि उन लाखों रिश्तों की है जो कागजों पर तो मजबूत लगते हैं, लेकिन कानून की नजर में कमजोर साबित हो जाते हैं। आइए, इस मामले को करीब से समझते हैं, बिना किसी जजमेंट के।

प्यार की शुरुआत, लेकिन शादीशुदा सच्चाई

सब कुछ इतना सिम्पल शुरू हुआ था। महिला, एक इंजीनियर, अपने सहकर्मी प्रोफेसर से मिली। वो शादीशुदा था, ये बात उसे पता थी। लेकिन प्रोफेसर ने अपनी पत्नी को ‘मानसिक रूप से बीमार’ बताकर उसकी सहानुभूति जीत ली। धीरे-धीरे रिश्ता गहरा होता गया। वे साथ रहने लगे, पैसे मिलकर खर्च करने लगे, दोनों के नाम पर प्रॉपर्टी खरीदी। यहां तक कि बच्चा पैदा करने के लिए IVF तक करवाया। महिला के लिए ये कोई अफेयर नहीं था – ये एक पूरा परिवार था।

वो सोचती थी, तलाक हो जाएगा, नया जीवन शुरू होगा। लेकिन रियलिटी चेक कुछ और ही था। पुरुष ने सबकुछ नकार दिया – कहा, ये बस एक इलीगल रिलेशन था, कभी कपल नहीं बने।

अदालत का सख्त रुख

महिला ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। पुणे सेशन कोर्ट ने उसकी अपील ठुकरा दी। फिर बॉम्बे हाईकोर्ट में गई। वहां जजों ने साफ कहा – अगर आप जानते हुए शादीशुदा आदमी के साथ रहते हैं, तो ये रिश्ता वैवाहिक नहीं माना जा सकता। साथ रहना, प्रॉपर्टी शेयर करना, या भावनात्मक बॉन्ड – ये सब कुछ नहीं बदलता। क्यों? क्योंकि पहली पत्नी और बच्चों के लीगल राइट्स को प्रोटेक्ट करना जरूरी है। कोर्ट ने इसे ‘अडल्टरी’ की कैटेगरी में रखा। महिला को कोई रिलीफ नहीं मिला। फैसला सुनाते हुए जजों ने कहा, कानून प्यार की गहराई नहीं देखता, बल्कि वैधता देखता है। ये सुनकर महिला का दिल टूट गया होगा, लेकिन कानून ने अपना काम किया।

महिला की गुहार

महिला ने कोर्ट में सब कुछ बयां किया। कहा, प्रोफेसर ने तलाक का वादा किया, बेहतर फ्यूचर का सपना दिखाया। जबरन फिजिकल रिलेशन बनाए, फिर शादी जैसा रिश्ता निभाया। उसके पास प्रूफ थे – जॉइंट अकाउंट्स, प्रॉपर्टी डीड्स, IVF रिकॉर्ड्स। लेकिन पुरुष ने काउंटर किया ये सब फ्रेंडशिप था, कोई मैरिड लाइफ नहीं। कोर्ट ने माना कि इमोशंस रियल हो सकते हैं, लेकिन लीगल मैरिज के बिना ये प्रोटेक्शन नहीं देता। महिला ने लिव-इन कोलीविंग को मैरिज का दर्जा देने की गुजारिश की, लेकिन कोर्ट ने साफ मना कर दिया। ये केस हमें सोचने पर मजबूर करता है – क्या प्यार ही काफी है?

समाज और कानून के बीच की खाई

ये फैसला सिर्फ एक महिला की हार नहीं, बल्कि मॉडर्न रिलेशनशिप्स पर सवाल उठाता है। आजकल लिव-इन, ओपन रिलेशनशिप्स कॉमन हैं। लेकिन अगर पार्टनर शादीशुदा हो, तो रिस्क बहुत बड़ा है। पहली पत्नी के राइट्स, बच्चों का फ्यूचर – ये सब प्रायोरिटी हैं।

सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों में लॉन्ग-टर्म लिव-इन को मैरिज जैसा स्टेटस मिला है, लेकिन शादीशुदा पार्टनर के केस में ये लागू नहीं होता। महिलाओं को सलाह? रिलेशनशिप में एंटर करने से पहले बैकग्राउंड चेक करो। लीगल मैरिज करो, या कोhabitation एग्रीमेंट साइन करो। वरना, सालों का प्यार एक झटके में बर्बाद हो सकता है।

आगे का रास्ता

इस केस से सीख मिलती है – प्यार अंधा होता है, लेकिन कानून नहीं। अगर आप ऐसे रिश्ते में हैं, तो लीगल एडवाइस लो। प्रॉपर्टी के लिए अलग डीड बनाओ, फाइनेंशियल ट्रांजेक्शन डॉक्यूमेंट करो। IVF या बच्चे के केस में पैरेंटेज लॉ पढ़ो। समाज बदल रहा है, लेकिन कानून धीरे-धीरे। ये फैसला महिलाओं को मजबूत बनाएगा, न कि तोड़ेगा। उम्मीद है, आने वाले दिनों में लॉ और इमोशंस के बीच बैलेंस बनेगा। फिलहाल, सावधानी ही सबसे बड़ा हथियार है।

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