भारत का विश्वसनीय रॉकेट PSLV एक बार फिर पटरी से उतर गया। 2026 की पहली लॉन्चिंग PSLV-C62 में तीसरे चरण की खराबी ने महत्वपूर्ण सैटेलाइट्स को कक्षा से वंचित कर दिया। इससे अंतरिक्ष कार्यक्रम पर सवाल उठने लगे हैं, लेकिन ISRO अब तेजी से सुधार की राह पकड़ रहा है।

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लॉन्च की शुरुआत और अचानक विफलता
श्रीहरिकोटा से सुबह दस बजे के करीब रॉकेट आसमान की ओर उड़ा। पहले दो चरण बिल्कुल सामान्य चले, इंजन की गर्जना ने सबको उत्साहित कर दिया। लेकिन आठ मिनट बाद तीसरा चरण अटक गया, जब थ्रस्ट में अचानक कमी आ गई। चैंबर प्रेशर गिरने से रॉकेट का रास्ता भटक गया, और सैटेलाइट्स सही ऊंचाई तक न पहुंच सके। यह लगातार दूसरी बार हुआ, जब PSLV का यह हिस्सा कमजोर साबित हुआ।
खोए सैटेलाइट्स का गहरा नुकसान
मिशन में DRDO का अहम निगरानी सैटेलाइट और 15 अन्य उपग्रह सवार थे, जिनमें विदेशी साझेदारों के भी शामिल थे। ये सैटेलाइट्स कृषि, आपदा प्रबंधन और सुरक्षा के लिए जरूरी थे। अब इनके बिना जमीनी स्तर पर कई प्रोजेक्ट्स रुक सकते हैं। खर्च हुए सैकड़ों करोड़ रुपये व्यर्थ हो गए, जो भारत की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं को झटका देंगे।
भारत की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षा पर साया
यह असफलता नए साल की शुरुआत में भारत की वैश्विक छवि को धूमिल करती है। किसानों की फसल निगरानी से लेकर सीमा क्षेत्र की नजर रखने तक, कई क्षेत्र प्रभावित होंगे। भरोसा कमजोर होने से विदेशी साझेदार पीछे हट सकते हैं। फिर भी, ISRO का इतिहास दिखाता है कि विफलताएं सीख का सबक बनती हैं, और जल्द ही वापसी संभव है।
ISRO की रणनीति
अब डेटा का गहन विश्लेषण चल रहा है। विशेषज्ञ टीम तीसरे चरण की कमजोरी की जड़ खोज रही है, जैसे प्रेशर ड्रॉप या नोजल की समस्या। संभावना है कि नए टेस्ट और डिजाइन बदलाव जल्द लागू होंगे। PSLV के अलावा GSLV या भारी लिफ्टरों पर फोकस बढ़ेगा, ताकि मिशन शेड्यूल बरकरार रहे। अगले लॉन्च में यह सुधार दिख सकते हैं।
भविष्य की राह
PSLV की विश्वसनीयता पर सवाल हैं, लेकिन ISRO की क्षमता अटल है। पिछले झटकों से उबरकर चंद्रयान और मंगलयान जैसे सफल मिशन दिए हैं। अब फोकस तकनीकी मजबूती पर होगा, जो भारत को अंतरिक्ष शक्ति बनाएगा। यह नाकामी अस्थायी है, असली परीक्षा सुधार में है।
















