
उत्तर प्रदेश की राजनीति में समय-समय पर राज्य के विभाजन का मुद्दा गरमाता रहा है,हाल ही में सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर यह चर्चा तेज हुई है कि क्या देश का सबसे बड़ा राज्य यूपी अब चार अलग-अलग राज्यों—पूर्वांचल, पश्चिम प्रदेश, बुंदेलखंड और अवध प्रदेश—में बंटने वाला है?
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क्या है वर्तमान स्थिति (2026)?
वर्तमान योगी आदित्यनाथ सरकार ने इस तरह की सभी अटकलों को सिरे से खारिज कर दिया है, सरकार का मानना है कि उत्तर प्रदेश की अखंडता ही इसकी सबसे बड़ी ताकत है और फिलहाल विभाजन का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है, बता दें कि राज्य के बंटवारे की नींव साल 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने रखी थी, जब उनकी सरकार ने विधानसभा में यूपी को चार हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेजा था। तब से यह प्रस्ताव ठंडे बस्ते में है।
नए राज्य बनाने की क्या है संवैधानिक प्रक्रिया?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत किसी नए राज्य का गठन किया जा सकता है। इसकी प्रक्रिया काफी जटिल और लंबी है:
- नए राज्य के गठन से संबंधित कोई भी विधेयक (Bill) संसद में पेश करने से पहले राष्ट्रपति की सिफारिश लेना अनिवार्य है।
- राष्ट्रपति इस विधेयक को संबंधित राज्य की विधानसभा (जैसे यूपी विधानसभा) के पास विचार के लिए भेजते हैं, हालांकि, संविधान के अनुसार संसद राज्य विधानसभा की राय मानने के लिए बाध्य नहीं है।
- विधेयक को लोकसभा और राज्यसभा में साधारण बहुमत (Simple Majority) से पारित होना होता है।
- संसद से पारित होने के बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होते ही नया राज्य कानूनी रूप से अस्तित्व में आ जाता है।
कौन लेता है आखिरी फैसला?
किसी भी नए राज्य के निर्माण या सीमाओं के विस्तार का अंतिम फैसला भारत की संसद ही लेती है, राज्यों के पास अपनी सीमाएं बदलने का कोई स्वतंत्र संवैधानिक अधिकार नहीं है, वे केवल प्रस्ताव पारित कर केंद्र से मांग कर सकते हैं।
















