
उत्तर प्रदेश सरकार ने बच्चों की पढ़ाई को लेकर एक बड़ा कदम उठाया है। RTE यानी राइट टू एजुकेशन एक्ट के तहत प्राइवेट स्कूलों में एडमिशन प्रोसेस को और आसान बनाने के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य करने का नियम हटा दिया गया है। अब गरीब और पिछड़े परिवारों के बच्चे बिना किसी दस्तावेजी झंझट के आसानी से स्कूल में दाखिला ले सकेंगे। ये बदलाव सुनने में छोटा लगता है, लेकिन जमीनी हकीकत में ये हजारों बच्चों के सपनों को पंख देगा।
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आधार कार्ड की अनिवार्यता हटी
पहले क्या होता था? ऑनलाइन फॉर्म भरते वक्त बच्चे और उसके माता-पिता दोनों के आधार नंबर डालना पड़ता था। कई बार गरीब घरों में आधार न होने या गलत डिटेल्स की वजह से एप्लीकेशन रिजेक्ट हो जाती थी। अब ये समस्या हमेशा के लिए खत्म! RTE कोटे के तहत निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में दाखिले के लिए न बच्चे का आधार चाहिए, न माता-पिता का।
सरकार का कहना है कि इससे पिछड़े तबके के बच्चे बिना रुकावट पढ़ाई शुरू कर सकेंगे। सोचिए, कितने परिवारों को अब सिर्फ एक साधारण फॉर्म भरना पड़ेगा और उनका बच्चा अच्छे स्कूल में एंट्री ले लेगा।
क्यों लिया ये फैसला?
अधिकारियों की मानें तो ये बदलाव इसलिए आया क्योंकि डॉक्यूमेंट्स की कमी से कई मेधावी बच्चे स्कूल की दहलीज तक नहीं पहुंच पाते थे। एडिशनल चीफ सेक्रेटरी (बेसिक एजुकेशन) पार्थ सारथी सेन शर्मा ने साफ कहा, “हमारा मकसद पिछड़े परिवारों के लिए शिक्षा का रास्ता बिल्कुल सरल बनाना है।” ये बात दिल को छू जाती है ना? भारत जैसे देश में जहां करोड़ों बच्चे गरीबी से जूझ रहे हैं, वहां RTE जैसी स्कीम्स ही उम्मीद की किरण हैं। अब एडमिशन प्रोसेस इतना आसान हो गया कि कोई बहाना नहीं चलेगा – बस बच्चा योग्य हो और RTE कोटे में आए।
रीइंबर्समेंट के लिए अब भी आधार जरूरी
हालांकि एडमिशन में ढील मिली है, लेकिन फाइनेंशियल मदद लेने वालों के लिए थोड़ा सिस्टम बदला है। स्कूलों को मिलने वाली रीइंबर्समेंट राशि अब सिर्फ माता-पिता के आधार से लिंक्ड बैंक अकाउंट में ही ट्रांसफर होगी। एप्लीकेशन फॉर्म में कम से कम एक पैरेंट की आधार डिटेल और बैंक खाते की जानकारी देनी पड़ेगी, लेकिन बच्चे की नहीं। ये बदलाव पारदर्शिता बनाए रखेगा और पैसे का सही इस्तेमाल सुनिश्चित करेगा। अच्छी बात ये है कि ये बोझ सिर्फ उन पर है जो मदद लेना चाहते हैं, एडमिशन तो बिना किसी शर्त के हो जाएगा।
उम्र के नए नियम
RTE के तहत उम्र की सीमा भी स्पष्ट कर दी गई है, ताकि बच्चे अपनी उम्र के हिसाब से सही क्लास में पढ़ें। देखिए लिस्ट:
- नर्सरी: 3 साल या उससे ज्यादा, लेकिन 4 साल से कम उम्र के बच्चे।
- लोअर किंडरगार्टन (LKG): 4 साल या उससे ज्यादा, लेकिन 5 साल से कम।
- क्लास 1: 6 से 7 साल के बच्चे।
ये नियम बच्चों के मानसिक विकास को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। उदाहरण के तौर पर, अगर आपका बच्चा 3 साल 6 महीने का है, तो वो सीधे नर्सरी में एंटर करेगा। इससे स्कूलों में भी अव्यवस्था नहीं होगी।
असर और उम्मीदें
ये बदलाव उत्तर प्रदेश के लाखों बच्चों के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है। खासकर ग्रामीण इलाकों और गरीब बस्तियों में जहां आधार कार्ड बनवाना भी मुश्किल होता है। सरकार की ये पहल न सिर्फ RTE को मजबूत करेगी, बल्कि समावेशी शिक्षा को बढ़ावा देगी। लेकिन सवाल ये है कि क्या जमीनी स्तर पर अधिकारी इसे सही से लागू करेंगे?
अभिभावकों को जागरूक करने के लिए कैंपेन चलाने चाहिए। कुल मिलाकर, ये कदम सराहनीय है और उम्मीद है कि दूसरे राज्य भी इसे अपनाएंगे। अगर आपका बच्चा RTE कोटे में आता है, तो जल्दी चेक करें – मौका हाथ से न निकले!
















