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जब भारत का हिस्सा बनने वाला था ‘दुबई’, फिर क्या हुआ ऐसा कि बदल गया इतिहास? जानें अनसुना सच।

दुबई का चमकता इतिहास: अंग्रेजी राज में दिल्ली के इशारे पर चलता था! 20वीं सदी में अरब का तिहाई हिस्सा ब्रिटिश इंडिया के कंट्रोल में – अदन से कुवैत तक। लॉर्ड कर्जन का ओमान को रियासत बनाने का सुझाव, गांधीजी की अदन यात्रा। 1937 में भारत से अलग। आज का दुबई, कल का दिल्ली कनेक्शन!

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जब भारत का हिस्सा बनने वाला था 'दुबई', फिर क्या हुआ ऐसा कि बदल गया इतिहास? जानें अनसुना सच।

कभी सोचा है कि आज का चमकता-दमकता दुबई, जो लग्जरी कारों, ऊंची इमारतों और शानदार मॉल्स का शहर है, वो कभी दिल्ली के इशारे पर चलता था? हां भाई, अंग्रेजी राज के जमाने में दुबई और पूरा खाड़ी इलाका ब्रिटिश इंडिया के कंट्रोल में था। आधुनिक दुबई की ग्लैमर स्टोरी के पीछे ये अनसुना इतिहास छिपा है। चलिए, इसकी मजेदार कहानी खंगालते हैं, जैसे पुरानी डायरी पलट रहे हों।

दुबई का ब्रिटिश इंडिया कनेक्शन

20वीं सदी की शुरुआत में अरब प्रायद्वीप का तिहाई हिस्सा ब्रिटिश इंडिया के जिम्मे था। अदन से कुवैत तक, ये सारे इलाके दिल्ली से ही चलाए जाते थे। भारतीय राजनीतिक सेवा के अफसर यहां राज करते, भारतीय सैनिक पहरा देते। इंटरप्रिटेशन एक्ट 1889 के तहत इन्हें कानूनी तौर पर भारत का हिस्सा माना जाता। दुबई पर आधिकारिक तौर पर कभी भारत का राज नहीं चला, लेकिन ब्रिटिश हुकूमत के जरिए दिल्ली का असर साफ दिखता। सोचिए, वो जमाना जब खाड़ी के तेल के कुओं पर भारतीय नजरें टिकी थीं!

लॉर्ड कर्जन का वो दिलचस्प सुझाव

वायसराय लॉर्ड कर्जन ने तो कमाल कर दिया। उन्होंने सुझाया कि ओमान को लूस बेल्या या किलात की तरह भारत की देसी रियासत बना लो। यमन के अदन में तो भारतीय पासपोर्ट ही जारी होते थे! 1931 में महात्मा गांधी अदन पहुंचे, तो अरबी युवाओं ने उनसे गले मिलकर बात की। गांधीजी ने खुद को भारतीय राष्ट्रवादी बताया। ये सुनकर लगता है न, जैसे इतिहास की किताबें कम ही पढ़ी हों हमने। ब्रिटिश राज अरब की रेत तक फैला था, लेकिन नक्शों में इसे गुप्त रखा जाता। पब्लिक दस्तावेजों में कभी नजर नहीं आता।

भारतीय सैनिकों की नजर में खाड़ी

भारतीय फौजियों की तैनाती इन इलाकों में आम थी। व्यापार, सुरक्षा, सब कुछ दिल्ली से कंट्रोल। दुबई जैसे पोर्ट सिटी तब छोटे-मोटे व्यापारिक केंद्र थे, लेकिन ब्रिटिश इंडिया की छत्रछाया में फल-फूल रहे थे। राजनीतिक एजेंट्स भारतीय सिविल सर्विस से आते, लोकल शासकों को लाइन पर रखते। ये कनेक्शन इतना गहरा था कि खाड़ी के लोग हिंदी-उर्दू के शब्दों से वाकिफ हो गए। आज भी दुबई में भारतीय कम्युनिटी का बोलबाला है – शायद वही पुराना रिश्ता जिंदा है।

1937: भारत से अलगाव की वो घड़ी

1920 के दशक में हवा बदली। भारत में राष्ट्रवाद उफान पर था, लोग साम्राज्यवाद से तौबा करने लगे। ब्रिटिशों को मौका मिला – 1 अप्रैल 1937 को अदन को भारत से काट दिया। किंग जॉर्ज VI ने टेलीग्राम भेजा: “अदन 100 साल से भारत का हिस्सा था, अब अलग।” ये अलगाव खाड़ी देशों के लिए आजादी की शुरुआत था। लेकिन सोचिए, अगर इतिहास ने करवट न ली होती, तो दुबई का बुरज खलीफा शायद दिल्ली के नक्शे में होता!

आज के दुबई में वो पुराना छाप

आज दुबई दुनिया का ट्रेड हब है – खेल, मनोरंजन, बिजनेस सब कुछ। लेकिन वो ब्रिटिश इंडिया का दौर याद दिलाता है कि इतिहास चक्रवर्ती है। लाखों भारतीय वहां कमाते हैं, सांस्कृतिक पुल बने हुए हैं। ये कहानी सिखाती है – ग्लैमर के पीछे रेत में दबी जड़ें होती हैं। अगर आप दुबई घूमने जा रहे, तो लोकल्स से पूछना “पुराने दिल्ली कनेक्शन के बारे में जानते हो?” जवाब सुनकर हैरान रह जाएंगे। इतिहास जीवंत है, बस नजरें खोलनी पड़ती हैं। 

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