देश का सबसे प्रतिष्ठित सम्मान भारत रत्न हर भारतीय के लिए सपना होता है। यह पुरस्कार उन व्यक्तियों को दिया जाता है जिन्होंने कला, विज्ञान, खेल या सार्वजनिक सेवा जैसे क्षेत्रों में अभूतपूर्व योगदान दिया हो। सवाल उठता है कि क्या यह सम्मान केवल मृतक को ही मिलता है या जीवित व्यक्ति भी इसके हकदार हो सकते हैं। आइए इसकी गहराई से पड़ताल करते हैं।

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भारत रत्न की शुरुआत और उद्देश्य
भारत रत्न की स्थापना 2 जनवरी 1954 को हुई थी। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इसे शुरू किया ताकि राष्ट्र निर्माण में योगदान देने वालों का सम्मान हो सके। शुरू में इसका दायरा सीमित था, लेकिन 2011 में नियम बदले गए और इसे किसी भी मानवीय प्रयास के क्षेत्र तक बढ़ा दिया गया। इसका मुख्य मकसद असाधारण उपलब्धियों को पहचान देना है, चाहे वह व्यक्ति किसी भी पृष्ठभूमि का हो। यह पुरस्कार जाति, धर्म या लिंग से परे होता है।
नामांकन और चयन प्रक्रिया
भारत रत्न के लिए कोई सार्वजनिक नामांकन या समिति नहीं होती। प्रधानमंत्री कार्यालय सीधे राष्ट्रपति को सिफारिश भेजता है। राष्ट्रपति की सहमति मिलने पर गजट अधिसूचना जारी होती है। आमतौर पर गणतंत्र दिवस या स्वतंत्रता दिवस पर यह प्रदान किया जाता है। एक साल में सामान्यतः तीन व्यक्तियों तक सीमित रहता है, हालांकि कुछ अपवादों में इससे अधिक भी दिए गए हैं। विदेशी नागरिकों को भी यह मिल चुका है, अगर उनका भारत से जुड़ाव गहरा हो। प्रक्रिया पूरी तरह गोपनीय रखी जाती है ताकि राजनीतिक दबाव न पड़े।
जीवित व्यक्तियों के लिए क्या कहते नियम?
हां, जीवित व्यक्ति को भारत रत्न निश्चित रूप से मिल सकता है। पुराने नियमों में मरणोपरांत देने की कोई बाध्यता ही नहीं थी। 1966 में पहली बार पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को मरणोपरांत दिया गया। उसके बाद से दोनों तरह के सम्मान होते रहे हैं। अब तक 50 से अधिक लोगों को यह पुरस्कार मिल चुका है, जिनमें कई जीवित थे जब उन्हें यह मिला। हालिया उदाहरणों में राजनीतिक नेताओं और वैज्ञानिकों को जीवित अवस्था में सम्मानित किया गया। नियम स्पष्ट हैं- योगदान ही आधार है, मृत्यु नहीं।
पुरस्कार के साथ जुड़ी सुविधाएं
भारत रत्न के साथ कोई नकद पुरस्कार नहीं होता। प्राप्तकर्ता को एक सनद (प्रमाण-पत्र) और पीपल के पत्ते के आकार का पदक मिलता है। इसके बदले जीवन भर कई विशेष सुविधाएं प्रदान की जाती हैं। एयर इंडिया और रेलवे में मुफ्त यात्रा, राज्य अतिथि का दर्जा, डिप्लोमैटिक पासपोर्ट जैसी व्यवस्थाएं होती हैं। प्रोटोकॉल में राष्ट्रपति के बाद सातवां स्थान मिलता है। सुरक्षा और अन्य सरकारी लाभ भी परिवार तक विस्तारित हो सकते हैं। राज्य सरकारें अतिरिक्त सम्मान देती हैं।
उपयोग के नियम और प्रतिबंध
संविधान के अनुच्छेद 18 के तहत प्राप्तकर्ता अपने नाम के पहले या बाद ‘भारत रत्न’ नहीं जोड़ सकता। पदक का दुरुपयोग वर्जित है। सम्मान एक बार दिया जाता है और इसे वापस नहीं लिया जा सकता। यह आजीवन रहता है। हाल के वर्षों में राजनीतिक हस्तियों पर बहस छिड़ी है, लेकिन योगदान ही निर्णायक होता है।
ऐतिहासिक उदाहरण और भविष्य
पहले पांच प्राप्तकर्ता- सीवी रमन, एस राधाकृष्णन जैसे वैज्ञानिक और दार्शनिक जीवित थे। नेल्सन मंडेला जैसे विदेशी को भी मिला। वर्तमान में बिहार जैसे राज्यों से मांगें उठ रही हैं कि स्थानीय नेताओं को यह मिले। भविष्य में नियम और लचीले हो सकते हैं, लेकिन मूल भावना वही रहेगी- राष्ट्रसेवा का सम्मान। यह पुरस्कार भारतीय लोकतंत्र की महानता को दर्शाता है। कुल मिलाकर, जीवित या मृत, योग्यता ही चयन का आधार है।
















